Thursday, April 18, 2019

उनके सियासी सफर का काला अध्याय


आज वे सलाखों के पीछे है। शायद अपने आप को कोश रहे होंगे। उन्हें अपने काले करतूतों की सजा मिली है। वह शक्स जो कभी बिहार में सत्ता और राजनीति के पर्याय माने जाते थे। लालू ही बिहार और बिहार ही लालू। पिछड़ो, दलितों और वंचितों के वे मसीहा माने जाते थे। उन्हें इस वर्ग का अपार स्नेह और समर्थन भी प्राप्त था। इसी जन समर्थन की बदौलत वे बिहार में सत्ता के शिखर पुरुष भी बने। उन्होंने पिछ्ड़ो और दलितों के उत्थान का कम भी किया। हालांकि इसकी नीव रखने का कम कर्पूरी ठाकुर ने पहले ही शुरू कर दिया था। कर्पूरी ठाकुर की  तैयार की गई जमीन को लालू प्रसाद जी ने अपने साथियों (राम विलास ,शरद यादव और नीतीश कुमार) के साथ मिलकर जरुर विस्तार दिया। सामंती जकडन और जातीय वर्चस्व वाले बिहार में पिछ्ड़ो, दलितों और आदिवासी हजारो सालो से सामंती शोषण से निकलने को छटपटा रहे थे। ऐसे में जब लालू प्रसाद ने भूरा बाल साफ करो का नारा दिया तो वे अचानक से पिछड़ो के मसीहा बन गये । जनता ने उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुचाया। किन्तु सत्ता सुख ने उन्हें सामाजिक न्याय के रास्ते से भटका दिया। वे धीरे -धीरे स्व केन्द्रित होने लगे। उन्होंने पिछ्ड़ो का सामाजिक उत्थान तो जरुर किया लेकिन उनके आर्थिक जरुरतो को या तो समझ नही पाये  या फिर जानते हुय भी अनदेखा कर दिया। उनके चश्मे की रोशनी अपने नाते रिश्तेदारों से आगे पहुचना बंद कर दिया। अब अराजकता ,अपहरण अपराध का दौर शुरू हो चुका था, जिसमे उनके अपने एवं करीबी  लोगो की भूमिका भी संदेहास्पद रही। जिसे लालू ने अनदेखा किया। बिहार पूरी दुनिया में पिछड़ेपन का प्रतीक बन गया। पंद्रह साल तक भी समय रहते न चेतने वाले लालू को नाराज जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। पिछले विधानसभा के चुनाव में नितीश कुमार के साथ गठबंधन से वह अपने बेटों को सदन पहुचाने में न सिर्फ कामयाब रहे बल्कि मंत्रीपद भी दिलाया, परन्तु बिना संघर्ष प्राप्त पद की कीमत बेटे ज्यादा समझ नही सके और सत्ता में वापसी का एक सुंदर मौका खो दिया. बहरहाल लोकसभा का चुनाव अपने पुरे शबाब पर है और भारतीय राजनीती की धुरी रहे लालू प्रसाद यादव रांची के बिरसा मुंडा कारागृह  में अपने राजनैतिक भविष्य की चिंता में करवटे बदल रहे है। आज़ उनके राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लगता दिख रहा है। देखना है की इस मुश्किल समय से पार्टी को निकाल पाने में वे और उनके बेटे कितने कामयाब होते है?
( ये लेखक के अपने विचार हैं.) 

Sunday, October 22, 2017

हमारी प्रक्रियाएं नीरस है, गणित नहीं

हमारी प्रक्रियाएं नीरस है , गणित नहीं!


अक्सर लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे की गणित बहुत ही नीरस या गंभीर विषय है. यह  पूरी तरह से उनका पूर्वाग्रह ही है .वास्तव में कोई विषय नीरस या गंभीर नहीं होता बल्कि हमारा रवैया उस विषय को आसान या गंभीर बना देता है . हमारे समाज में गणित के बारे में तमाम ऐसी पूर्वाग्रह ग्रस्त धारणाएँ प्रचलित है- जैसे गणित सबके बस की बात नहीं , मुझे नही आता तो तुम्हे क्या खाक आएगा ,गणित बहुत मेहनत का विषय है, बिना पीटे गणित नही आ सकता आदि .ऐसी ही धारणाओ ने गणित का हौआ बनाया .जबकि स्थिति इसके ठीक विपरीत है. गणित का हम सभी के जीवन से गहरा जुडाव है. हम सोते जागते संख्याओ, आकड़ो से खेलते रहते है. हर पल, हर घडी गणित के संपर्क में रहते है फिर निरसता कैसे?
गणित तब अरुचिकर हो जाता है जब उसे जीवन में होने वाले क्रियाकलापों से बिलकुल अलग कर दिया जाता है. नीरस तरीकों से अंकों और अवधारणाओ को रटवाना प्रारंभ कर दिया जाता है. ठोस वस्तुओं को प्रतीकों के रूप में शामिल करने की बजाय अमूर्त प्रतीकों में उलझा दिया जाता है.केवल परीक्षा में अधिक अंक लाने का शिक्षणशास्त्र शिक्षार्थियों को गणित से दूर करता जा रहा है. 
राहुल पटेल

Monday, February 13, 2017

Friday, January 31, 2014

शिक्षक की सामाजिक हैसियत

शिक्षक की सामाजिक हैसियत

किसी भी समाज व देश के विकास में शिक्षा अपनी अहम भूमिका निभाती है। इस विकास की प्रक्रिया में शिक्षक का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। पिछले बीस वर्षों में स्कूली शिक्षा का विस्तार हुआ, समाज में बच्चों कि स्थिति , पाठ्यचर्या सुधार आदि की दिशा में सकारात्मक प्रयास किए गए, पर अध्यापक के पेसे के साथ लगातार दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा। छठे वेतन आयोग ने नए वेतनमान दिए, पर इस आयोग के लागू होने के बहुत  पहले बड़ी संख्या में अनेक राज्यो में पारा-शिक्षक , शिक्षा-मित्र , संविदा शिक्षक , पंचायत शिक्षक , प्रखण्ड शिक्षक  आदि भांति-भाति के नामों से जाना जाने वाला सम्पूर्ण हिन्दी भासी राज्यों में एक प्रकार का अर्ध-शिक्षक बल खड़ा किया जा चुका था। जिनकी मासिक आय रास्ट्रिय वेतन आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम  वेतन की आधी भी नहीं थी।   देश कि सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने तो इन्हे शिक्षा का शत्रु तक बता डाला।  

                       बहरहाल एक तरफ शिक्षा के अधिकार  कानून का कागज लिए करोड़ों बच्चे शिक्षा का हक मांगने निकलें हैं, दूसरी तरफ उनके अधिकार को यथार्थ बनाने वाला व्यक्ति स्वयं संघर्षरत है। फिर सवाल उठता है की सामाजिक और आर्थिक हैसियत से ठोकर खाता यह पेसा क्या स्वयं के अस्तित्व को बचा पाएगा?

Wednesday, April 18, 2012

तपस्या कीजिये मैं तो तापस भाव भर दूंगा ! तिमिर जब छाएगा – उजेले राहभर दूंगा !!

Gamgeen hun phir v muskurana chahta hun,
Khamosh chehron ko hasana chahta hun,
Bana dunga ek din iss zami ko jannat,
Mai SAHIL hu ashiyana chahta hu.

Monday, August 4, 2008

कहा कोई मिला जिसपर दुनिया लुटा देते
हर एक ने दिया धोखा किस किस को भुला देते
अपने दिल का दर्द दिल में दबाये रखा
जो करते बयां तो महफ़िल को रुला देते ।

Saturday, August 2, 2008

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा

किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा

और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा